“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘योगेन्द्र
शर्मा ’ की तेवरियाँ
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जन्म-20 जुलाई, 1950, अलीगढ़
शिक्षा-एम.ए.,बी.एस.सी.
लेखन-कविताएं, कहानियां, लघुकथाएं, लेख
सम्प्रति-नौकरी
संपर्क- 19@8 कृष्णा पुरी, अलीगढ़
रचना-प्रक्रिया-
समकालीन संदर्भों में जीवन अपने-आप में एक अजीबो-गरीब
व्यंग्य बन कर रह गया है। यहां तक कि मुस्कराना भी एक त्रासदी जैसा लगता है। कविता
इन्हीं स्थितियों में जीते हुए जन्म लेती है।
एक
शहद लगाकर डिग्री को अब चाटिए श्रीमन्!
बेकारी की धूल यूं ही फांकिए श्रीमन्!
है चपरासी की पोस्ट, चाहते
पी.एच.डी.
ग्रेजुएट हैं आप तो फिर भागिए श्रीमन्!
यूं हनुमान चालीसा पढ़ना व्यर्थ है
मंत्री जी की सोर्स कुछ तलाशिए श्रीमन्!
हां आप रहे हैं इक उन्मुक्त परिंदे पर
यूं यादों की एलबम मत झांकिए श्रीमन्!
दे दे इन्टरव्यू फट गये जूते-चप्पल
लेके आये सिर्फ दर्द पर डाकिए श्रीमन्!
बना दिया है बड़ा आदमी डैडी ने
बेकारी को हंस कर झेले जाइए श्रीमन्!
चाट बेचते कुछ सहपाठी आपके
कोई धंधा ऐसा ही अब छांटिए श्रीमन्!
आरक्षित श्रेणी में नाम आपका हो
ऐसी कोई तोप आज तो दागिए श्रीमन्!
+योगेन्द्र शर्मा
दो
फूल माली ने तोड़े साहिब!
हुए सावन भी भगोड़े साहिब!
बोझा औकात से ज्यादा ढोते
लोग इक्के के घोड़े साहिब!
कई किश्तों में आत्महंता हम
मगर सबूत न छोड़े साहिब!
कथा ‘सत्यनारायण’ की सुनकर
सत्य तो सबने मरोड़े साहिब!
वाह रे जुर्म तुझे क्या कहिए?
हाय थाने भी न छोड़े साहिब!
प्यार बेहतर है करें कुत्तों से
सभ्य मानव तो तोड़े साहिब!
जिंदगी पायी गयी ऋण की तरह
हिसाब जितने भी जोड़े साहिब!
ग़ज़ल की बात नहीं यह कोई
हैं ये ‘तेवरी’ के कोड़े
साहिब!
+योगेन्द्र शर्मा
;तीन
डाकुओं की तुम ही सहारौ थानेदार जी!
नाम खूब है रह्यौ तिहारौ थानेदार जी!
सच्चे, ईमानदार डूब गये नदी बीच
गुंड्डन कूं रोज तुम तारौ थानेदार जी!
धींगरा ते कबहूं न पेश त्यारी पडि़ पायी
बोदे-निर्बल कूं ही मारौ थानेदार जी!
आप कभी आयौ जो अपने मौहल्ला बीच
कांपि जाय गली-गलियारौ थानेदार जी!
क्या मजाल आंख कोई तुम से मिलाय जाय
रोज नयी छोकरी निहारौ थानेदार जी!
मारि-मारि घूंसा-लात हड्डी-हड्डी तोडि़ देत
अकड़ै जो कोई बजमारौ थानेदार जी!
देवै नहीं घूंस कोई, फिर
तो जी आपकौ
फौरन ही चढि़ जात पारौ थानेदार जी!
सच बोलिवे की अजी आदत-सी पड़ी गयी
माफ करो कह्यो सब हमारो थानेदार जी!
;चार
वही छिनरे, वहीं
डोली के संग है प्यारे!
देख ले ये सियासत के रंग हैं प्यारे!
टूटे मंदिर पे कोई नहीं फटकता है
पूजा ‘औ’ पूंजीवाद
एक रंग हैं प्यारे!
किसका कद लम्बा है ईश्वर-अल्ला में
रोज इस बात पे छिड़ें जंग हैं प्यारे!
सांप मर जाये और लाठी भी नहीं टूटे
आज के युग में ये नेताई ढंग हैं प्यारे!
तू न कहे मेरी और मैं न कहूँ तेरी रे
इस हम्माम में सब नंग-धड़ंग हैं प्यारे!
सारे सम्पादकों के तलवे चाट डाले हैं
कुछ के छपने के यही तो ढंग हैं प्यारे!
कितनी नजदीक अब आ गई है तेरे मौत
तेरे पावों तले बारूदी सुरंग हैं प्यारे!
सीने में आग और आँखों आंसू हैं
आजकल दुखते हुए अंग-अंग हैं प्यारे!
;पांच
जिंदगी पीर बन गयी यारो!
दुःख की तासीर बन गयी यारो!
शोख रंगों की खींचातानी में
भोड़ी तस्वीर बन गयी यारो!
एक उलझन हमारे सीने में
कृष्ण का चीर बन गयी यारो!
ये सदी अब भी बहुत प्यासी है
सिंधु का तीर बन गयी यारो!
भूख की फसलें लोग काटेंगे
भूख जागीर बन गयी यारो!
इस सियासत को हाय क्या कहिये?
आँख का नीर बन गयी यारो!
इस व्यवस्था में बे-ईमानों की
अच्छी तकदीर बन गयी यारो!
जिंदगी थी कभी फूलों की तरह
आज शमशीर बन गयी यारो!
;छः
यूँ न हो तू बे-करार, आयेगा
समाजवाद
और यूं ही मर ले यार, आयेगा
समाजवाद।
पेट में रोटी न हो, तन पर
न हो कपड़ा मगर
गाओ सावन की मल्हार, आयेगा
समाजवाद।
हाँ खुदा की ही तरह, कागज
पे है वो कहीं
जल्द लेगा अवतार, आयेगा
समाजवाद।
सब्र थोड़ा-सा रखो, हो जायेगा, हो जायेगा
काला-सफेद एकाकार, आयेगा
समाजवाद।
देखना सपने अजी छोड़ो नहीं, छोड़ो
नहीं
नींद में ही हर बार, आयेगा
समाजवाद।
और भी लूटेंगे तुमको हर कदम पर देखना
सेठ, तस्कर, साहूकार, आयेगा
समाजवाद।
आप के सीने के ऊपर से चलेगी हर जगह
नेता मंत्री जी की कार, आयेगा
समाजवाद।
आंख तर करने से बेहतर मुट्ठियां तू तान ले
हार प्यारे यूं न हार, आयेगा
समाजवाद।
+योगेन्द्र शर्मा
;सात
इस धर्मभीरू देश में भगवान टोपियां
क्या गुल खिला रही हैं शैतान टोपियां।
वातानुकुलित कमरों बैठी हैं इसलिए
इस देश के दुःखदर्द से अन्जान टोपियां।
तस्करों की खातिर हैं ये तो कश्तियां
इन्सां के डूबने का है सामान टोपियां।
महलों को देखो कर रही हैं आजकल आबाद
पर झोपड़े बना रहीं शमशान टोपियां।
देशद्रोहियों के सरों पे हैं विराजमान
मुकुटों-सी लिये हुए आनबान टोपियां।
रक्त चूसती हैं यारो! फिर भी ये सफेद
अब गांधीवादियों की महान टोपियां।
फैला के एक जाल वादों का, नारों
का
कर रही हैं किस कदर हैरान टोपियां।
जनता के बीच आती हैं कदमों को चूमती
पर उसके बाद होतीं आसमान टोपियां।
+योगेन्द्र शर्मा
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