Thursday, September 5, 2019

“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘सुरेश ‘त्रस्त’’ की तेवरियाँ


“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘सुरेश त्रस्त’ की तेवरियाँ
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जन्म- 7 सितम्बर 1947 अलीगढ़

शिक्षा-इन्टरमीडियेट

लेखन-कविताएं, लघुकथा, लेख

सम्प्रति-चिकित्सक

संपर्क- 46, आ.वि. कालोनी, सासनी गेट अलीगढ़

रचना-प्रक्रिया-
भूख गरीबी शोषण बहुत निकट से देखे व भोगे हैं। लेखन इन्हीं त्रासद स्थितियों की उपज रहा है।


एक
दलदल में है गाड़ी बहिना!
गाड़ीवान अनाड़ी बहिना!

दुख के पैंबंदों ने जकड़ी
खुशियों की हर साड़ी बहिना!

पांव सुकोमल तेरे, संसद-
कांटों वाली झाड़ी बहिना!

देख जरा खूनी पंजों ने
बगिया आज उजाड़ी बहिना!

सांस-सांस पर दुःखदर्दों की
चलती आज कुल्हाड़ी बहिना!

कहां रही है अब जीवन में
आदिमगंध पहाड़ी बहिना!

आज नहीं है ज्वार हृदय में
मंदिम-मंदिम नाड़ी बहिना!

हुयीं सरलरेखा-सी बातें-
अब तो तिरछी-आड़ी बहिना!
+ सुरेश त्रस्त


;दो
जीना है दुश्वार सखी री!
होते अत्याचार सखी री!

चैराहों पर इज्जत लुटती
मगर मौन सरकार सखी री!

सुख की झलक नहीं जीवन में
दर्दों की भरमार सखी री!

चोरों के संग मिले हुए हैं
सारे पहरेदार सखी री!

घिरे हुए है दुःखदर्दों से
मन के सब उद्गार सखी री!

कुंठाओं का बढ़ता जाता
हर सीने पर भार सखी री!

चमन उजाड़ रहे हैं माली
सिसक रहा गुलजार सखी री!

हर चेहरा अब त्रास्तयहां है
बहती अंसुवन धार सखी री!
+ सुरेश त्रस्त



तीन
नहीं नेह का आंचल भइया!
मिलती नफरत प्रतिपल भइया!

सम्हल-सम्हल कर अब चलना तू
जगह-जगह है दलदल भइया!

आज सिसकती पायल भइया!
अश्कों से तर आंचल भइया!

कब बरसेंगे बादल जाने?
सूखे सभी कमल-दल भइया!

वो करते ऐसे छल भइया!
बोते रहते विषफल भइया!

सोच-सोच हालात देश के
नैना बहते अविरल भइया!

दुःख जैसे तन पर चाबुक है
अब तो हर तन घायल भइया!

उगता यहाँ आजकल भइया!
बस नारों का जंगल भइया!
+ सुरेश त्रस्त



;चार
अब तो प्रतिफल घात है बाबा!
दर्दों की सौगात है बाबा!

मन की पीड़ा किसे सुनायें?
कौन पूछता बात है बाबा?

पीते-पीते जहर सत्य का
शख्स हुआ सुकरात है बाबा!

बादल गम के घिर-घिर आते
आंखों में बरसात है बाबा!

आदमखोर भेडि़ये सब हैं
सबकी खूनी जात है बाबा!

नारेबाजी भाषण तक
नेता की औकात है बाबा!

कहीं न सूरज उगता दीखे
तममय हुआ प्रभात है बाबा!

त्रस्तमिटा तम, ला तू दिनकर
अब गहराती रात है बाबा!
+ सुरेश त्रस्त


;पांच
आदमी खूं में सना है आजकल
दर्द चाकू-सा तना है आजकल।

कल्पनाएं परकटी सब हो गयीं
और आहत भावना है आजकल।

खुशियां हुई सन्यासिनी, वनवासिनी
सहवासिनी तो वेदना है आजकल।

इसकी हर दीवार में हैं सिसकियां
ये महल खूं से बना है आजकल।

हर किसी में तिलमिलाहट-सी है एक
दर्द कुछ हद से घना है आजकल।

है सही जो मुल्क में उस आदमी की
किस कदर आलोचना है आजकल।

एक टुकड़ा सुख न मिल पाता हमें
आदमी दुःख ने हना है आजकल।

हम मनायें बोलो इसको किस तरह?
त्रस्ततो कुछ अनमना है आजकल।
+ सुरेश त्रस्त


;छः
है हंगामा शोर आजकल भइया रे!
हुए मसीहा चोर आजकल भइया रे!

दर्द लगे है ऐसे हमको साथी-सा
जैसे चांद-चकोर आजकल भइया रे!

हम सबकी रख ली हैं खुशियां राजा ने
झोली बीच बटोर आजकल भइया रे!

अब तो चाहे जिधर आदमी को देखो
बड़ा दुःखी हर ओर आजकल भइया रे!

मनमानी फर्जी प्यादे अब करते हैं
हुए बड़े मुंहजोर आजकल भइया रे!

हर लमहा अब रहे मौत के हाथों में
अपनी जीवन-डोर आजकल भइया रे!

सरे-राह अब लुटती रहतीं महिलाएं
बहुत पाप घनघोर आजकल भइया रे!

त्रस्तकहे- अब बात बतायें हम किसकी?
सब हैं आदमखोर आजकल भइया रे!
+ सुरेश त्रस्त



सात
क्रोध की मुद्रा बनाओ दोस्तो
जड़ व्यवस्था की हिलाओ दोस्तो!

इस जगह के लोग आदमखोर हैं
आदमी को अब बचाओ दोस्तो!

जन विरोधी लोग जो, उनके खिलाफ
अब मशालों को जलाओ दोस्तो!

सांपनी करती है केवल विष-वमन
दूध कितना भी पिलाओ दोस्तो!

बहुत अश्कों को पिया तुमने मगर
पीर को अब मत पचाओ दोस्तो!

जिसमें लुट जाती है इज्जत आबरू
उस सियासत को मिटाओ दोस्तो!

आज लें संकल्प जुल्मों के खिलाफ
हाथ अब आगे बढ़ाओ दोस्तो!

त्रस्तकी इन मुटिठ्यों में आग है |
त्रस्तकी भी आजमाओ दोस्तो!
+ सुरेश त्रस्त






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