“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘अजय अंचल
’ की तेवरियाँ
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जन्म-12 फरवरी, 1955
शिक्षा-हाईस्कूल
लेखन-कविताएं
सम्प्रति-नक्शानबीस
सम्पर्क- कटारी बालान, जयगंज, अलीगढ़
रचना प्रक्रिया-
यहां हर चीज बिकाऊ है, यहां
तक कि ईमान भी। लेखन और समाज के प्रति ईमानदारी बरतता हूं तो बड़ी सुतुष्टि मिलती है।
एक
इस तरह मिलने लगा है प्यार, कोई
क्या करे?
हर गली में प्यार का व्यापार, कोई
क्या करे?
चीखने से फायदा क्या?, और कोई
बात कर
आजकल गूँगी हुई सरकार, कोई
क्या करे?
हो न जाए हादिसा ऐ यार पुल की पीठ पर
टूटने के हो गये आसार, कोई
क्या करे?
पेट में रोटी नही, तन पर
कोई कपड़ा नहीं
अब किसी के बास्ते शृंगार कोई क्या करे?
एक मुठ्ठी अन्न भी होता नहीं हमको नसीब
आजकल मेहमान का सत्कार, कोई
क्या करे?
क्या कोई रुक कर करेगा? आज इस
छत के तले
हर खुशी है रेत की दीवार, कोई
क्या करे?
कुर्सियाँ सिखला रहीं हैं आदमी को देखिए
हर कदम पर इक नया व्यभिचार, कोई
क्या करें?
हर सदन अब मुल्क में देख ले ‘अंचल’ यहाँ
तस्करों का हो गया दरबार, कोई
क्या करे?
*अजय अंचल
दो
हर जगह भूखी खडी़ है जिन्दगी, अब देखिए
आदमी को छल रही है रोशनी, अब देखिए।
जिस्म नंगे हो गये इस मुल्क में, अब क्या
कहें?
लोग इसको कह रहे हैं सादगी, अब देखिए।
लग रहा है आज हमको हर खुदा बहरा हुआ
थक गये घंटे, सिसकती
आरती, अब देखिए।
चाँदनी ने आदमी के जिस्म छलनी कर दिये
क्या खिलाए गुल यहां पर धूप भी, अब देखिए?
कल कोई सुकरात-सा कहने को सच होगा खड़ा
इसलिए पीने लगी है विष सदी, अब देखिए।
इन मृर्गों की, मेंमनों
की हाय रे अब खैर हो
घूमती जंगल में हिंसक शेरनी, अब देखिए।
घर दबोचा भूख ने अब हर शहर हर गांव को
हर जगह है आजकल यह त्रासदी, अब देखिए।
जिन्दगी में हर खुशी की ‘अंचल’ अब बन
कर कहार
दर्द लेकर चल रहे हैं पालकी, अब देखिए।
*अजय अंचल
तीन
रहनुमा सैयाद होते जा रहे हैं देश में
भेडि़ये आबाद होते जा रहे हैं देश में।
‘गौतम’ जिन्हें
हमने कहा इस सदी में दोस्तो
आज वो जल्लाद होते जा रहे हैं देश में।
बन सके ना आदमी जो आदमी के बीच में,
ईश की औलाद होते जा रहे हैं देश में।
शौक जिनको भी रहा है मुस्कराने का यहां,
और भी नाशाद होते जा रहे हैं देश में।
इस तरह आई यहां पर हर जगह फस्ले-बहार
सुख सभी अवसाद होते जा रहे हैं देश में।
इस निजामे-बेबसी में वक्त के एहसास सब
दर्द की तादाद होते जा रहे हैं देश में।
कल खिलेगा इस जगह हंसता हुआ कोई गुलाब,
इसलिए हम खाद होते जा रहे हैं देश में।
आदमी सहता रहा जुल्मो-सितम ‘अंचल’ मगर
जिस्म अब फौलाद होते जा रहे हैं देश में।
*अजय अंचल
चार
हर चीज ही अब तो नकल है यार अपने मुल्क में
ऐसा चर्चा आजकल है यार अपने मुल्क में।
कर के चोरी-रहजनी हो गये मुजरिम फरार
योजना उनकी सफल है यार अपने मुल्क में।
कत्ल कर मुंसिफ कहे जाते हैं कातिल आजकल
शैतान में बेहद अकल है यार अपने मुल्क में।
आज जैसे इक जरूरत-सी गरीबी हो गयी
भूख का कोई न हल है यार अपने मुल्क में।
आदमी अब तो यहां पर इक खुशी के नाम पर
पी रहा मीठा गरल है यार अपने मुल्क में ।
वह करे विद्रोह आकर आज अपने साथ में
जिसमें मिरे बाजू-सा बल है यार अपने मुल्क में।
अब बदलना है जरूरी हर तरह इसका दिमाग
आदमी बस राशि-फल है यार अपने मुल्क में।
कल नजर आयेंगे चेहरे इन्कलाबी कुछ यहां
उग रही ऐसी फसल है यार अपने मुल्क में।
*अजय अंचल
;पांच
रात खुशियों की यहां ढलने लगी है बंधु अब
भावना हर शख्स की जलने लगी है बंधु अब।
रहनुमा जल्लाद सारे हो गये इस देश के
आबरू घुटनों के बल चलने लगी है बंधु अब।
बन गया है एक थाना आजकल घर के करीब
खौफ से दीवार तक हिलने लगी है बंधु अब।
आग पीड़ाओं की इतनी बढ़ गई है जेहन में
मोम-सी हर जिंदगी गलने लगी है बंधु अब।
इस व्यवस्था ने दिये, अनगिन
जखम इन्सान को
बात नारों की बहुत खलने लगी है बंधु अब।
हो गयीं इस देश में जनतंत्र की बातें बहुत
उनकी यह जादूगरी छलने लगी है बंधु अब।
जान की लेवा व्यवस्था हो गई है देश में
मूंग छाती पे यहां दलने लगी है बंधु अब।
अब कोई ज्वालामुखी दहकेगा हर इक जिस्म में
इक बगावत हर जगह पलने लगी है बंधु अब।
*अजय अंचल
;छः
पाप के आने लगे चहरे उभर के सामने
साफ है तस्वीर अब उनकी नजर के सामने।
आ गया है वक्त अब व्यभिचारियों की खैर हो
आबरू उनकी लुटेगी उनके घर के सामने।
इस तरह घुट-घुट के रोना छोड़ दे, हक छीन
ले
कब तलक रोयेगा तू इस बेअसर के सामने।
बांध दे ताबीज कितने भी हमारी बांह पर
मुट्ठियां तन कर रहेंगी बाजीगर के सामने।
अब नहीं कोई लुटेगा कारबां इस मुल्क का
हम रखेंगे यह हकीकत राहबर के सामने।
एक मुट्ठी भी तनी गर अब बगावत के लिये
क्या झुकेगी वो किसी फिर शीशघर के सामने।
हौसले इसके अभी कुछ और भी होंगे बुलंद
आंधियां जितनी उठेंगी इस शजर के सामने।
वो किसी को लूट लें, पर यार
हम खामेश हों
हो नहीं सकता कभी अपनी नजर के सामने।
*अजय अंचल
;सात
हर तरफ है आँधियाँ पर ज्योति जलनी चाहिए।
शैतान की शैतानियत बस अब कुचलनी चाहिए।
नाखुदा मदहोश है, कश्ती
भंवर में जा रही
डूब जायेगी यहाँ कश्ती, सम्हलनी
चाहिए।
पीर को पाला बहुत हमने हृदय के बीच में
हर बशर के दिल से यह बिल्कुल निकलनी चाहिए।
जो करो तुम आज ही, सोचो
नहीं, फौरन करो
बात कोई मन की अब, कल पै
न टलनी चाहिए।
चैन सारा डस गयीं, विषधर
हुई यह टोपियां
विषबुझी कोई छुरी इन पर उछलनी चाहिए।
एक जोकर-सा है अभिनय अब तुम्हारा मंच पर
आज तो इस मंच की बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर किसी के दिल में हो, इक दहकता
ज्वालामुखी
हर जगह अब आग-सी इक आग मिलनी चाहिए।
कब तलक यूं ही चलेगा रहनुमाओं का चलन
अब बगावत की यहाँ पर नींव डलनी चाहिए।
*अजय अंचल
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