“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘ज्ञानेन्द्र
‘साज़’’ की
तेवरियाँ
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जन्म-2 जुलाई, 1948, अलीगढ़
शिक्षा-स्नातक 1962
लेखन-कविताएं
सम्प्रति-व्यापार
संपर्क-17@219 जयगंज, अलीगढ़
202001
रचना-प्रक्रिया-
शासन को कुशासन होते, सत्य
को असत्य होते, मानव को दानव होते जब-जब भी देखता हूँ, रचना
लिख बैठता हूँ।
एक
लूट रही सरकार, साथी
जाग रे
कर कोई उपचार, साथी
जाग रे।
तेरे-मेरे सबके तन पर है अब तो
महंगाई की मार, साथी
जाग रे।
लुट, अपहरण और डकैती से अब तो
रंगे हुए अखबार, साथी
जाग रे।
सब के सब इक थैली के चट्टे-बट्टे
नेता, चैकीदार, साथी
जाग रे।
आज व्यवस्था की हर कुर्सी पर प्यारे
गुंडों की भरमार, साथी
जाग रे।
इक नम्बर के धंधे सबने छोड़ दिये
नम्बर दो से प्यार, साथी
जाग रे।
काम नहीं आयेगी तेरे ये डिग्री
है शिक्षा बेकार, साथी
जाग रे।
प्रजातंत्र की छुरियां तुझ पर उछल रहीं
तू होजा खूंख्वार, साथी
जाग रे।
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
;दो
होती है लूटमार, आज पेट
के लिये
गूंगी हुई सरकार, आज पेट
के लिये।
अस्मत बिकाऊ चीज बन गयी है दोस्तो
है जिंदगी बाजार, आज पेट
के लिये।
स्वार्थ की नगरी में अब देखिए आदर्श
होने लगे व्यापार, आज पेट
के लिये।
सच्चाइयों से वास्ता इनका नहीं रहा
खामोश हैं अखबार, आज पेट
के लिये।
अब चोर औ’ सिपाही के रिश्ते तो देखिए
है भाई जैसा प्यार, आज पेट
के लिये।
कम तोलना या ब्लैक या महंगाई बढ़ाना
है सारा कारोबार, आज पेट
के लिये।
नैतिकता छोड़ दी है जमाने ने क्या कहें?
है प्यार भी व्यभिचार, आज पेट
के लिये।
मंदिर में ‘साज़’ भेडि़ये
मिलने लगे हैं अब
करते है यौनाचार, आज पेट
के लिये।
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
तीन
हर चीज का अभाव, कोई
देखता नहीं
इस दर्द का बसाव, कोई
देखता नहीं।
बचती नहीं अब आबरू थाने के सामने
इन रक्षकों के दाव, कोई
देखता नहीं।
जनतंत्र, तानाशाही, प्रजातंत्र
है मजाक
जन-जन का अब घिराव, कोई
देखता नहीं।
डाकू, लुटेरे, कातिलों, व्यभिचारियों
की ओर
नेताओं का झुकाव, कोई
देखता नहीं।
ले जा रही है देश को न जाने किस तरफ?
इस तंत्र की ये नाव, कोई
देखता नहीं।
बाहें फड़क रही हैं औ मुठ्ठी तनी हुई
कुछ चेहरों पे है ताव, कोई
देखता नहीं।
बदबू-सी आ रही है व्यवस्था के जिस्म से
सड़ने लगे हैं घाव, कोई
देखता नहीं।
मेहनतकशों के गांव में हैं भूख के ऐ ‘साज़’
जलते हुए अलाव, कोई
देखता नहीं।
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
चार
मत करो अब प्यार की बातें
बस करो सरकार की बातें।
हर जेहन को कर रहीं छलनी
आजकल अखबार की बातें।
देवता की मूर्ति के पीछे
हो रही व्यभिचार की बातें।
हैं फरेब, स्वार्थ और झूठ
आज शिष्टाचार की बातें।
इस बार भी खा गयी सत्ता
वोट के अधिकार की बातें।
राख के नीचे दबे हैं हम
हममें हैं अंगार की बातें।
अब नहीं तो कल सुनेंगे लोग
क्रान्ति के उद्गार की बातें।
‘साज़’ की इस
तेवरी में हैं
तीर औ’ तलवार की बातें।
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
पांच
जिंदगी कितनी हंसी है दोस्तो!
पर किसी की भी नहीं है दोस्तो!
हर खुशी अब आदमी के गाल पर
एक झुर्री-सी जड़ी है दोस्तो!
भूख से लाचार औ’ टूटा हुआ
मुल्क में हर आदमी है दोस्तो!
रहनुमा पीते लहू इन्सान का
भेडि़या-सी तिश्नगी है दोस्तो!
एक हो जाओ व्यवस्था के खिलाफ
क्यूं अभी चुप्पी सधी है दोस्तो!
मुटिठ्यों में पत्थरों को देखकर
हर सदन में खलबली है दोस्तो!
उस तरफ रंगरेलियों में लोग हैं
इस तरफ फाकाकशी है दोस्तो!
आदमी है तेवरी के तेवरों-सा
‘साज़’ ने चर्चा
सुनी है दोस्तो!
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
;छः
है ये थोथी बात, महंगाई
रोको
बड़े बुरे हालात, महंगाई
रोको।
रसगुल्लो की बात यहां पर कौन करे?
मिले न रोटी-भात, महंगाई
रोको।
फटी रजाई और कड़कता जाड़ा है
कैसे काटें रात? महंगाई
रोको।
एम.ए., बी.ए. किया, जेब
पर खाली है
हर पल खायें मात, महंगाई
रोको
स्वारथ से हटकर कुछ सोचो नेताओ!
मानो मेरी बात, महंगाई
रोको।
हमसे सहन नहीं होते हैं अब सुन लो
बहुत सहे आघात, महंगाई
रोको।
कुछ सोचो यदि इन्क्लाब लाते हैं हम
क्या होंगे हालात? महंगाई
रोको।
भूखे तन पर सुख के बादल कब बरसे?
दर्द हुए बरसात, महंगाई
रोको।
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
सात
कैसा चलन हुआ है, मेरे
देश का?
गौरव रेहन हुआ है, मेरे
देश का।
कब दिखलायी गयीं मशालें असुरों को?
रावण-दहन हुआ है, मेरे
देश का।
बेकारी, बदहाली औ’ कंगाली
से
घायल जेहन हुआ है, मेरे
देश का।
सुख औ ईर्ष्या आजकल हर इक चेहरे पर
जैसे कफन हुआ है, मेरे
देश का?
लोग यहां हर जगह खून के प्यासे हैं
रक्तिम-गगन हुआ है, मेरे
देश का?
खुदगर्जों, मक्कारों
को कुर्सी मिलती
कैसा चयन हुआ है, मेरे
देश का?
आदर्शों की बात आप क्यूं करते हैं?
खोटा रतन हुआ है, मेरे
देश का।
नासूरों का तरह सभ्यता रिसती है
कितना गलन हुआ है, मेरे
देश का?
+ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
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