“इतिहास घायल है” [तेवरी-संग्रह] से ‘दर्शन ‘बेज़ार’’ की
तेवरियाँ
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दर्शन ‘बेज़ार’
जन्म-22नवम्बर 1948, पचगाई
खेड़ा ;आगरा
शिक्षा-बी.एस सी@बी एस.
सी, इन्जीनियरिंग
;ससम्मान
सम्प्रति-यांत्रिक अभियन्ता
लेखन-कविताएं
पता-द्वारा वीरेन्द्र कुमार, 1@243, सुरेन्द्र
नगर, अलीगढ़।
रचना-प्रक्रिया-
अपने परिवेश के आस-पास नैतिक मूल्यों का ह्रास जब-जब
टीसता है,
कविताएं दिमाग में चक्रवात की तरह घुमड़ने लगती है।
;एकद्ध
कह रहा हूँ विवश हो यह तथ्य में
पल रही है वेदना आतिथ्य में।।
जो विदूषक मंच पर हँसता रहे
सिसकियाँ भरता वही नेपथ्य में।।
नर्तकी के पाँव घायल हो रहे
देखता अय्याश कब यह नृत्य में?
सिर्फ समझौता नहीं है जिन्दगी
एक जलती आग भी है सत्य में।।
*दर्शन ‘बेज़ार’
;दो
स्वागत में सभी व्यस्त हैं सरकार की खातिर
कोई न दवा लायेगा बीमार की खातिर।।
अब मानता है कौन सच्चे नेह के बन्धन
सम्बन्ध के टुकड़े हुए व्यापार की खातिर।।
उनकी आँखों में तिरे फुटपाथ के सपने
जो घर बनाना चाहते परिवार की खातिर।।
बनकर के खिलौना किसी मुफसिल की जवानी
बाजार में बैठी है खरीदार की खातिर।।
सब लोग लगाते मेरे ईमान की बोली
नीलामी बची है गमे-‘बेज़ार’ की खातिर।।
*दर्शन ‘बेज़ार’
;तीन
हर हृदय में बढ़ रही अब पीर है
देश की हालत बड़ी गम्भीर है।।
प्रश्न रोटी का सभी वक्ष में
आज-कल चुभता हुआ-सा तीर है।।
दौड़ में निर्णायकों ने ही कसी
धावकों के पाँव में जंजीर है।।
कायरों का लोग अभिनन्दन करें
‘औ’ उपेक्षित-सा
यहाँ हर वीर है।।
सड़क पर असहाय पांडव देखते
हरण होता द्रौपदी का चीर है।।
*दर्शन ‘बेज़ार’
;चार
शब्द अब होंगे दुधारी दोस्तो
जुल्म से हैं जंग जारी दोस्तो।।
सत्य को सम्मान देता कौन है?
झूठ का सिक्का है भारी दोस्तो।।
सभ्यताओं के सजे बाजार में
बन गयी व्यापार नारी दोस्तो।।
लूट में मशगूल है हर रहनुमा
लुट रही जनता बिचारी दोस्तो।।
आदमी के रक्त में मदमस्त जो
टूटनी है वो खुमारी दोस्तो।।
*दर्शन ‘बेज़ार’
;पाँच
शान अब खोने लगी है देश की
आँख नम होने लगी है देश की।।
बात अब ईमान की मत कीजिए
रूह तक सोने लगी है देश की।।
वहशियों की सभ्यता कांधों पे अब
जिन्दगी ढोने लगी है देश की।।
दलबलुओं का करिश्मा देखकर
आत्मा रोने लगी है देश की।।
आज कुर्सी की लड़ाई हर जगह
आबरू धोने लगी है देश की।।
*दर्शन ‘बेज़ार’
;छः
अब कलम तलवार होने दीजिए
दर्द को अंगार होने दजिए।।
रोकिए मत वक्त के सैलाब को
तेज उसकी धार होने दीजिए।।
सभ्यता के नाम पर ये जिस्म का
बन्द अब व्यापार होने दीजिए।।
इस जमीं का जालिमों के खून से
फिर नया शृंगार होने दीजिए।।
आदमीयत के लिए जो लड़ रहा
मत उसे ‘बेज़ार’ होने
दीजिए।।
*दर्शन ‘बेज़ार’
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