Thursday, September 5, 2019

“इतिहास घायल है” [तेवरी-संग्रह] से ‘विजयपाल सिंह’ की तेवरियाँ


“इतिहास घायल है” [तेवरी-संग्रह] से ‘विजयपाल सिंह’ की तेवरियाँ
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विजयपाल सिंह
जन्म-10जुलाई-1965, महौ ;अलीगढ़

शिक्षा-एम.ए.हिन्दी

सम्प्रति-अध्ययन

लेखन-कविताएं

पता-ग्राम@पोस्ट-महौ, जिला-अलीगढ़।

रचना-प्रक्रिया-
सामाजिक-क्रान्ति के लिए कविता मेरे लिए एक साधन, एक विकल्प, एक हथियार की तरह प्रयुक्त की जाने वाली चीज है।

;एक
जब किसी भट्टी में ये परिवेश लोहे सा-तपेगा
देश का हर आदमी औजार कोई तब गढ़ेगा।।

जुल्मो-सितम की आग माँ के गर्भ में पलती रही तो
कोख से तब देखना ज्वालामुखी एक जन्म लेगा।।

टीसते हालात फिर से इस तरह के हो गए हैं
अब भगत सिंह क्रान्ति का इस देश में पर्चा पढ़ेगा।।

सिलसिला यह यातनाओं का अगर चलता रहा तो
फिर किसी आजाद के पिस्तौल हाथों में उठेगा।।

हर किसी की देखना तब मुट्ठियां भिंचने लगेंगी
न्याय जब झूठा मिलेगा, सत्य जब शूली चढ़ेगा।।
*विजयपाल सिंह


;दो
सच्चाई को ख्वाब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?
सूरज को महताब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?

जो चेहरा खूनी पंजों ने नोच-नोच रक्तिम कर डाला।
उसको सुर्ख गुलाब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?

लदी हुई है आज अश्रु से, जिस नारी की बेबस आँखें।
उनको जाम-शराब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?

एक रेप अंकित है जिस धड़कन पर, उसको।
उल्फत का सैलाब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?

एक क्रान्ति को खत लिखकर तुम फिर से देखो।
आते नहीं जवाब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?
*विजयपाल सिंह



;तीन
आप अपनी हकीकत छुपायेंगे कब तक?
नकाबों में सम्मान पायेंगे कब तक?

रोटियाँ तक न जो दे सकें आदमी को।
ऐसे अभियान कहिए, चलायेंगे कब तक?

फूल को कर जुदा टहनियों से चमन की।
यूं गुलदस्ते अपने सजायेंगे कब तक?

विदेशों से ले-ले के कर्जा वतन की।
ऐसे गरीबी हटायेंगे कब तक?

आप सोयेंगे संसद में कितने दिनों तक?
हम किबाड़ों दस्तक लगायेंगे कब तक?
*विजयपाल सिंह



;चार
आंधियों का सर कुचलना चाहिए
साथियो मौसम बदलना चाहिए।।

जो सवेरा हर ज़ेहन में कर सके
आज वो सूरज निकलना चाहिए।।

फिर समय की मांग है कुछ इस तरह-से
ठोकरें खाकर सम्हलना चाहिए।।

आग में तपकर निखरती वेदना
इस तरह का ख्वाब पलना चाहिए।।

यदि हिमालय झूठ का लांघे युधिष्ठर
तो समूचा जिस्म गलना चाहिए।।
*विजयपाल सिंह


;पांच
देश हुआ बीमार देश में
ये कैसे आसार देश में?

आजादी कुर्सी के नीचे
लुटती बारम्बार देश में।।

जिसे मसीहा लोग समझते
कर जाता वह वार देश में।।

कर्तव्यों की चिन्ता किसको?
सब चाहें अधिकार देश में।।

बस जनता को चूस-चूस कर
पनप रहे गद्दार देश में।।
*विजयपाल सिंह



;छः
इस देश में तो वर्जना पूजी गयी
हर घिनौनी आस्था पूजी गयी।।

सांस घुटने से बचाने के लिये
एक जहरीली हवा पूजी गयी।।

बात अमृत की चली तो यह हुआ
बज्म में लाकर सुरा पूजी गयी।।

इस तरह से आदमी हिंसक हुआ
जंगलों की सभ्यता पूजी गयी।।

अप्रकाशित रह गया सच देश में
झूठ की हर पुस्तिका पूजी गयी।।
*विजयपाल सिंह

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