“इतिहास घायल है” [तेवरी-संग्रह] से ‘अनिल ‘अनल’’ की
तेवरियाँ
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पूरा नाम-अनिल कुमार सक्सैना
जन्म-1जनवरी-1956,नगला
नौकस ;अलीगढ़
शिक्षा-एम.ए.,एल-एल.बी.
सम्प्रति-अधिवक्ता
लेखन-गीत, कविताएं, लेख
आदि।
सम्पर्क-17@25, रंगमहल, जयगंज, अलीगढ़।
रचना-प्रक्रिया-
समकालीन व्यवस्था के संत्रास से उत्पन्न छटपटाहट, बौखलाहट
कविता में सहज ही उतर आती है। देश को बेचने वालों के विरुद्ध कविता मेरे लिए एक हथियार
का काम करती है।
;एक
आजकल हर आदमी सहमा हुआ है
हर शहर में इस कदर जलसा हुआ है।।
एकता की बात की जब रहबरों ने
देश का तब-तब नया टुकड़ा हुआ है।।
हर नदी का जल कहीं ठहरा हुआ है
इस तरह का भी हमें धोखा हुआ है।।
बात इन्सानों के जैसी कर रहा है
यानि अब वो भी कोई चीता हुआ है।।
चीखता है स्वप्न में बेइन्तहा अब
नींद में भी आदमी जागा हुआ है।।
तेवरी की बात भी अब कर जरा तू
क्यों ग़ज़ल के हुस्न में अटका हुआ है?
*अनिल कुमार सक्सैना
;दो
बात जुल्मों की बढ़ चली लोगो!
पीर हर मन में अब पली लोगो!
हर तरफ अब तो आदमी की यहाँ
नस्ल मिलती है दोगली लोगो!
गांधी भुनता रहेगा कब तक यूं
चलेगी कितनी धांधली लोगो!
देश कंचन-सा तपा उस युग में
आग जिस दौर में जली लोगो!
आज आसार हैं बगावत के
सब में है एक बेकली लोगो!
*अनिल कुमार सक्सैना
;तीन
दुश्मनों के वार पर मुस्काइए।
इस सियासी प्यार पर मुस्काइए।।
फिक्र मत कीजे किसी के कत्ल की।
आप बस तलवार पर मुस्काइए।।
द्रौपदी का चीर खींचा जाय तो।
आंसुओं की धार पर मुस्काइए।।
ब्लैक में सब कुछ मुहैया है यहाँ।
सिरफिरे बाजार पर मुस्काइए।।
योजनाएं ढो रही हैं फाइलें।
देश के उद्धार पर मुस्काइए।।
*अनिल कुमार सक्सैना
;चार
अब किसे चिन्ता यहाँ ईमान की?
फिक्र है सबको महज सम्मान की।।
जब हुए टुकड़े किसी परिवार के।
धूप भी बांटी गयी दालान की।।
यदि चले बस तो यहाँ के साजिशी।
बेच देगें रोशनी दिनमान की।।
कर रही हैं खोखला इस देश को।
बे-वजह की आदतें गुणगान की।।
सत्य का अमृत पियेंगे लोग क्यों?
जिनकी रुचियां हैं वही विषपान की।।
*अनिल कुमार सक्सैना
;पांच
आप जी-भर गुनाह की लीजे
खड़े फर्जी गवाह कर लीजे।।
सारी खुशहालियों को चर जाओ
देश को चारागाह कर लीजे।।
रहबरी से ही कुछ नहीं बनता
रहजनी की भी चाह कर लीजे।।
आपको हक है आप साहब हैं
चाहें जिसको तबाह कर लीजे।।
कल जुल्मों का मनेगा मातम
आज बस वाह-वाह कर लीजे।।
*अनिल कुमार सक्सैना
;छः
देश भर में अब महाभारत लिखो
आदमी को क्रान्ति के कुछ खत लिखो।।
बाग में अब चहचहाहट है नहीं
हर परिन्दा है यहां आहत लिखो।।
होने लगा आक्रोश लोगों का युवा
बाजुओं में आ गयी ताकत लिखो।।
एक पगड़ी-सा उछाला है जिसे
अब नहीं जायेगी वो इज्जत, लिखो।।
खेलना अंगार से हर दौर में
है हमारी आज भी आदत लिखो।।
*अनिल कुमार सक्सैना
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