Thursday, September 5, 2019

“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘अरुण लहरी’ की तेवरियाँ


“अभी जुबां कटी नहीं” [तेवरी-संग्रह ] से ‘अरुण लहरी’ की तेवरियाँ
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जन्म- 8 मई, 1956 कानपुर

शिक्षा- स्नातकोत्तर, ;समाज शास्त्राद्ध

लेखन- कविताएं

सम्प्रति-संघर्ष

संपर्क-टीकाराम विल्ंिडग, आगरा रोड़, अलीगढ़।

रचना प्रक्रिया-
देश चेतना-शून्य होता जा रहा है, चील,गिद्ध, कौवे उसे           नोच-नोच कर खा रहे हैं। ऐसे में मेरी कविता गुलेल               का काम करे, यही प्रयास रहत


1.
भ्रष्टाचार धर्म है उनका
दुर्व्यवहार धर्म है उनका।

बेच रहे हैं वे सौगंधें
अब व्यापार धर्म है उनका।

वे सुर्खी-दर-सुर्खी में हैं
बस अखबार धर्म है उनका।

राखी, रिश्ता वे क्या जानें?
यौनाचार धर्म है उनका।

देश लुटे, उनको क्या चिन्ता?
कुर्सी-प्यार धर्म है उनका।

डूबेगी हर नाव यकीनन
बस मंझधार धर्म है उनका।

वे क्या जानें जनहित यारो!
नरसंहार धर्म है उनका।

लड़वाते हैं हिंदू-मुस्लिम
रक्ताहार धर्म है उनका।
*अरुण लहरी

दो
कुंठित हर इंसान है भइया
सीने में तूफान है भइया।

हर चेहरा बस नीलकंठ है
करता अब विषपान है भइया।

दर-दर भटके शिक्षित यौवन
कितना परेशान है भइया?

अब तो सुख की कोई चिड़िया
भरती नहीं उड़ान है भइया।

इन सदनों में हर-एक चेहरा
कितना बेईमान है भइया?

घूम रहा ओढ़े चिथड़ों को
अपना हिंदुस्तान है भइया।

सब व्यभिचारी पाप धो रहे
कैसा कुम्भ-नहान है भइया?

सिर्फ समाजवाद आने तक
अटकी अपनी जान है भइया।
*अरुण लहरी

तीन
खादी आदमखोर है लोगो!
हर टोपी अब चोर है लोगो!

सत्ता उनके हाथों में है
उन पर किसका जोर है लोगो?

उनने किया हलाल सब जगह
संविधान का मोर है लोगो!

जाने कैसी चली हवा ये
दुखती पोर-पोर है लोगो!

हर बर्दी खूनी है अब तो
गली गली में शोर है लोगों!

कहकर मुकर जाए बातों से
हर नेता शहजोर है लोगों!

लदी हुई आंसू से हरदम
अब काजल की कोर है लोगो!

सब गिनते हैं अंतिम साँसें
टूटी जीवन-डोर है लोगो!
*अरुण लहरी


;चार
हमने देखी उल्फत उनकी
हर-इक छलिया आदत उनकी।

जहर दवा के नाम से बेचें
देख लीजिए हिकमत उनकी।

उनने डाला सच पर पर्दा
हुई इस तरह शोहरत उनकी।

वे अब नागों को पाले हैं
हर सीने में दहशत उनकी।

हर आंचल की खुशहाली को
खा जाती है वहशत उनकी।

हर मेले में,, हर जलसे में
सदा मिलेगी शिरकत उनकी।

वे क्या जाने दर्द हमारा?
बस औरों  फुरसत उनकी।

आज बना डालो तुम यारो
चैराहों पर तुरबत उनकी।
*अरुण लहरी


;पाँच
हर नैया मँझधार है प्यारे!
टूट गई पतवार है प्यारे!

हर कोई भूखा नंगा है
ये कैसी सरकार है प्यारे!

उन पेड़ों का ओ पंछी सुन!
हर पत्ता खूख्वार है प्यारे!

शिक्षा पाकर बी.ए., एम.ए.
हर कोई बेकार है प्यारे!

यहाँ स्वार्थ का और झूठ का
अब स्वागत-सत्कार है प्यारे!

सरकारी दफ्तर में देखो
कितना भ्रष्टाचार है प्यारे?

लूट, डकैती छाप रहा है
अब तो हर अखबार है प्यारे!

आज व्यवस्था का ये पग-पग
हर सीने पर भार है प्यारे!
*अरुण लहरी


छ:
इस तरह के वे विधेयक आजकल लाने लगे हैं
लोग अपना मुल्क कहने में भी शरमाने लगे हैं।

सत्य की तकरीर देती है यहां पर टोपियाँ
दर-हकीकत इस तरह वे हमको भरमान लगे हैं।

घुल गया है इन हवाओं में जहर कुछ इस तरह
साँस लेने में भी अब तो लोग घबराने लगे हैं।

पूछिए मत किस का अब यहाँ पर है निजाम?
आजकल हर शख्स की वो खाल खिंचवाने लगे हैं।

आ गया है वक्त अब झुक जायेंगे पर्वत सभी
सिंधु के उफान अब चोटी से टकराने लगे हैं।

देखकर आक्रोश सड़कों पर उतरता आजकल
कुर्सियां हिलने लगी, कुछ लोग घबराने लगे हैं।

हर नदी निशान से ऊपर उठी है दोस्तो!
आजकल तटबंध सारे खौफ में आने लगे हैं।

किस तरह पायेंगे काबू आग पर वे लोग अब?
हिमखण्ड भी ज्वालामुखी-से ताव दिखलाने लगे हैं।
*अरुण लहरी


सात
हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं आजकल
स्वार्थ की कुछ सीढि़यों पर चढ़ रहे हैं आजकल।

पक्ष औप्रतिपक्ष की कैसी सियासत हो गयी?
जंग कुर्सी की सभी तो लड़ रहे हैं आजकल।

देखिए उनकी प्रगति का ढंग अपने देश में
लाखों टन अनाज यूंही सड़ रहे हैं आजकल।

कितना ऊंचा उठ गया है शिक्षा-स्तर दोस्तो!
परदेश में बच्चे उन्हीं के पढ़ रहे हैं आजकल।

इस तरह उनने भरा साहस सभी में यार अब
हर शहर, हर गांव डाके पड़ रहे हैं आजकल।

जेब, कतरे आदमी की हर जगह बाजीगीरी
इस तरह के वे शगूफे गढ़ रहे हैं आजकल।

तस्करी, कालाबजारी में सने हैं उनके हाथ
देश की तस्वीर कैसी मढ़ रहे हैं आजकल?

योजना, परियोजना की फाइलों के देखिए
कागजी घोड़े सभी तो अड़ रहे हैं आजकल।
*अरुण लहरी

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