“इतिहास घायल है” [तेवरी-संग्रह] से ‘गजेन्द्र ‘बेबस’’ की
तेवरियाँ
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पूरा नाम-गजेन्द्रपाल सिंह
जन्म-24 सितम्बर 1962, महौ
;अलीगढ़
शिक्षा-एम.एस-सी. ;गणित
सम्प्रति-अध्ययन
सम्पर्क-ग्राम-पोस्ट-महौ, जिला-अलीगढ़।
लेखन-कविताएं, कहानियां, नाटक
आदि।
रचना-प्रक्रिया-
आज मानवीय सम्बन्ध आदमी से आदमी के बीच सिर्फ स्वार्थ
का समीकरण बनकर रह गये हैं, मेरे लिए कविता आदमी को इस दुरभिसन्धि से
बचाने का एक प्रयास है।
;एक
कोयले की जिन्दगी अब तक जिये हैं
खान के मजदूर जैसे हम रहे हैं।।
रात बबलू ने कहा पापा बताओ-
पेट-भर चावल हमें किस दिन मिले हैं?
जब कभी भी भूख में आकाश ताका
पूर्णिमा के चांद से शोले झड़े हैं।।
एक दूरी को बताते उम्र बीती
लक्ष्य तक हम मील के पत्थर हुए हैं।।
जब कभी भी क्रान्ति बोयी है समय ने
तिलमिलाते सोच के पौधे उगे हैं।।
*गजेन्द्रपाल सिंह
;दो
कैसा हमने निजाम पाया है?
सत्य का कत्ले-आम पाया है।।
आया जब भी बसन्त का मौसम
हादसों का पयाम पाया है।।
कैसे कह दें कि बेडि़यां टूटीं?
देश अब भी गुलाम पाया है।।
अच्छी थी इससे राह की भटकन
अजीब-सा मुकाम पाया है।।
चाहे जितना दमन करो लोगो
क्रान्ति ने कब विराम पाया हैं?
*गजेन्द्रपाल सिंह
तीन
अधेंरे में जो लोग पुजते रहे हैं
सवेरे की लाली से डरते रहे हैं।।
झीलों के पत्थर पे पानी न रोको
यहाँ पैर लाखों फिसलते रहे हैं।।
इस आग को भी महसूस करिए
हम बर्फ में भी उबलते रहे हैं।।
गन्तव्य तक राह जाती है वो ही
जिस राह पर पाँव जलते रहे हैं।।
ये कैसी खुशियों की पुस्तक है यारो
जहाँ हादिसे सिर्फ पढ़ते रहे हैं।।
*गजेन्द्रपाल सिंह
;चार
जिन्दगी से है अपरचित जिन्दगी
जिन्दगी को यू समर्पित ज़िन्दगी।।
सभ्यता का अर्थ इतना रह गया
जी रहे हैं लोग कल्पित जिन्दगी।।
आदमी का दर्द है उनमें शरीक
जिन मशीनों को है अर्पित जिन्दगी।।
वक्त ने ठोंका जिसे एक कील-सा
एक खूंटी-सी है अंकित जिन्दगी।।
हर किसी एहसास के टुकड़े हुए
और टुकड़ों में है अर्जित जिन्दगी।।
*गजेन्द्रपाल सिंह
;पांच
आ गयी जो एक निर्धन के यहाँ
अब खुशी मेहमान जैसी हो गई।।
लोग चन्दे की तरह से खा गये
जिन्दगी अनुदान जैसी हो गयी।।
तोलती है आदमी के दर्द को
आंख भी मीजान जैसी हो गयी।।
जब खुमैनी हो गये विश्वास तो
त्रासदी ईरान जैसी हो गई।।
फूल ने जब बात की आक्रोश की
पाँखुरी चट्टान जैसी हो गई।।
*गजेन्द्रपाल सिंह
;छः
जो रह नहीं पाये कभी इन्सान की तरह
वे पुजे हैं आजकल भगवान की तरह।।
घर हमारा रात में वे लूटते यारो
दिन में आते जो यहाँ मेहमान की तरह।।
इतिहास क्या है, कुछ
नहीं है,
कुफ्र का जादू
जिसमें लिखी हैं साजिशें ईमान की तरह।।
इस दौर में तो सभ्यता, आदर्श
या सच को
महसूसते हैं लोग अब अपमान की तरह।।
वो गरीब ही सही खुद्दार है, उसे
मत कीजिए प्रयोग पायदान की तरह।।
*गजेन्द्रपाल सिंह
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